Wednesday, May 25, 2011

For Old & Oldest of Friends..

याद कि जैसे धूप हुई है

एक एक सीढ़ी उतरी है

मन के सूने गलियारे में

गौराइया सी चहकी है

याद हुई है सांझ सुनहरी

चौबारे पर पसरी है

टुकड़ा टुकड़ा कतरा कतरा

मुंदरों पर सिमटी है

याद तुम्हारी खत का पुर्ज़ा

किसी ज़िल्द में छिपा हुआ

गीत, छन्द और भाव बिना

आडी तिरछी बिखरी है

याद हुई है मंद पवन सी

हौले हौले चलती है

भीतर बाहर वीरने में

किलकरी सीगूँजी है

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